Monday, 12 February 2018

दिठौना मंगल है

शुभ्र वसन की दस्तक में
धवलश्री सुने मैने
कपाल की दाई ओर
शीश झुके मृदुल नेने

           दानव बुद्धि बुझाकर
           काले नीम काटते है
           प्रभु मग में चलते जाते
           दनुज शूल पाटते है

सीप शंख में जलधि
सिमटकर रह गया
अंजुल दानों की माफिक लल्ला के
बीच उमंग के तेरे थे
मीत लगाकर कह गया

           शिव थाति , अमित
           प्रेम का प्याला
           नश्वर प्रेम के भाव में
           डूब गया निराला

भले भजन में डीग हांकता
मनुहारी मन मेरा
सांवरे खिले अधर लेकर आया
तन ठन नर्तन आँगन उजेरा।

" जगमग आनन "

देख पताका फेरा है
संगमरमर की थाली में
राकेसी रूप समान
छुपा आनन जाली में

भीतर के उजियारे
पुंज भेदकर बाहर निकल आये
मुकुल सतह पर
देखो ये शीतल छाए

अंधियारे में देखो
शिखा क्या खूब नृत्य करती है
मग में ठहरे रही से
क्या वह डरती है?

अर्ध मज्जा में ललन मन
रहता है
गहन रागिनी में कलकल
स्वन करके बहता है।

Sunday, 11 February 2018

परिणीति

'' परिणीति  ''

 डोर बंधी  ह्रदय  से होकर 
आत्मा तक  पकड़ की 
असहाय जीवन  को  बल  देकर 
गाथा एक भव्य जड़ दी 

                                        एक सुहाना  , भीना  आभास 
                                        यह मौसम स्वस्थ पहचाना 
                                        दर्शन अर्ध खिन्न क्षण पर सकल भारी 
                                        नर्त्तन अमा ने चढ़ाया इसपर  बाना 

विविध सांसो में  खलबली 
आकार निराकार  का प्रत्यक्षी 
संस्कार के पार नीलकंण का टुकड़ा 
कनक वेद का दुलारा सुंदर तक्षि 

                                       
                                       आंगन  में फूलवारी पर तुषार 
                                       लाल कुसुम की लालिमा 
                                       गोद में  मासूम महिमा का सब 
                                       दुर्लभ विहंगम असीम दूर फैली शुभ सी अमा। 

Friday, 9 February 2018

ठिठक

" ठिठक "

झिडकती वात में धुल
आँगन को उड़ाती है
फ़िजा की सल्तनत को
चुनौती का रूप दिखलाती है

                          आलस्य रेन में भीगे तन का
                          स्वांग स्वांग ठिठुरता है
                          सर्द मस्तक को लग जाये
                          इसका भय करता है

केश गगन की ओर बढ़ते है
अंजुल जोर से रगड़
भित्तियों की आड़ में
लहू की चहलपहल पकड़

                         आज बदल गए मौसम
                         जलवायु की थकान से
                         प्रकृति के अंगीकरण में
                         भू भाग की रौनक मिटी
                         आलस्य को परहेज जतन से

किसलय की वृंत सूखी नही
धुप के अभिषेक से
ये तड़पती मनुजों के
परस्पर अतिरेक से

                        पर्वत खड़े जिसके संघर्ष
                        ने उन्हें खड़े रहने का बल दिया
                        भाग्यशाली भुवन जिसे
                        जगमग कल खिलखिलाता आज दिया।
'वृद्ध जीवन '

अंजुल फैलाकर  मेंनें याचना 
मांग लिया 
भयभीत  हुए मन , आत्मा ने 
अंत  होना  ठान  लिया 

                             विजय दिवस तब मनाऊंगा 
                            जब  राष्ट्र का एक  एक  बच्चा प्रफुल्लित  होगा 
                           मेरे विचार में  , मेरी  निद्रा  भुखी  होगी 
                          किन्तु  राष्ट्र पुरूष  का जनमानस 
                          मानवता  की  भावनाओ से द्रवित होगा। 

जलाशय जब सूखे थे 
मन  मेरा तब विचलित था 
उषा के भूखे रूप देखकर 
मरू ह्रदय  में , पिघला मीत  था। 


                            रम्भा  उर्वशी मिलकर रूदन  में 
                            समय व्यतीत  करते है 
                            सिसकियाँ निर्धनों की सुनकर 
                          निशि राकेश से लड़ते है। 

परिणाम  द्व्न्द  गीत के  क्या
गाऊ ,  चीखे  निर्दोषों  की  सुनता  हूँ 
ऐ मीत  आत्मा  के भारत 
पग पग स्वयं  को  अंतिम  गिनता  हूँ। 
आत्मीय शांति का अभाव 

मै सामान्य बातों की चर्चा न करते हुए आज की हमारे दैनिक जीवन में घटती घटनाओ का जिक्र करूंगा। 
 
आज हम बेहतर जीवन स्तर जी रहे है। इसका मतलब यह नहीं की हम भाग्यशाली है। 

जीवन स्तर अच्छा हो यह भी बुरी बात नहीं लेकिन बेहतर जीवन स्तर होना भाग्यशाली होना  नहीं है।

मै  इस बात को अभी यही छोड़ देता हूँ। मै आपका ध्यान थोडा दूसरी ओर ले जाना चाहूंगा। 

अभी यूपी में आधार कार्ड नहीं होने पर एक बुजुर्ग की मौत हो गई। इसके इतर ३९ बरस 
के एक व्यक्ति के पास राशन  नहीं था वह भी भूख के चलते मर गया। उसके कुल घर की कीमत  २००० हजार रू थी। माँ वृद्धा थी। मै यह सवाल पूछना चाहता हूँ। बुलेट ट्रेन की घोषणा ने ह्रदय को ख़ुशी तो दी। किन्तु बिन आधार के मेरे राष्ट्र के लोगों की मौतें भी तो चिंतित करती है। तकनीक के इस दौर में जीवन स्तर में सुधार तो आया लेकिन लोगो की अनिश्चित मौतें ह्रदय को चिंतित करती है। सुनियोजित हत्याओं ने पुनः सोचने पर मजबूर कर दिया। क्या हम हमारे देश के लोगों को स्वतंत्र जीने का अधिकार भी नही  दे सकते ?  जहां हम एक कुत्ते के लिए लाखों खर्च करते है। वहां क्या  हम अपनी बिरादरी [हम वतन] को जीने मात्र तक का राशन नही दे सकते ? सोचिये और निर्णय कीजिये नफरत कभी इंसान का फायदा नहीं कर सकती। 

Tuesday, 6 February 2018

नारी 

नारी नाज है 
सर्वसमाज का अभिमान 
हर कूचे इलाके का नूर
सृष्टि की रचियता 
भगवान को जन्म देने का विज्ञानं

धरती की दूरी, हर दूरी का ज्ञान 
नजरे जहां तक मिलाए 
मुक्त की विभूति का आभास 
हे जीवंदायिनी मुफ्त मेंजीवन जीना सिखाये 
क्योकिं , नारी नाज है। 

राजनीति से औधौगिक घराने की दोस्ती कानून पर भारी पड़ जाती है?

  नमस्कार , लेख को विस्तृत न करते हुए केवल सारांशिक वेल्यू में समेटते हुए मै भारतीय राजनीत के बदलते हुए परिवेश और उसकी बढ़ती नकारात्मक शक्ति ...