Monday, 2 July 2018

अँधेरा घना है !

अगस्त्य की वाणी सही थी
घोर कलयुग बुरा आएगा
निशाचर कोई सतत भू पर
विपुल विकटता बरसायेगा।

         उजडी अऊसर वसु पर
         छाती मनु है अपनी पीटेंगे
         नेह की कमी का लाभ
         असुर अनय के रूप में करेंगे।

जीवन की अदृश्य कहानी
क्या बतलाऊं राकेश तुझे
कश्ती की पतवार टूटी
सवार एक स्वर में जूझे।
     
          किंचित मन में विरह
          बाजुओं के सो जाने की
          है कोई आशा किसी वीर
          के रक्षा के लिए आने की!

अब है निराश नीरज का हिय
कूलों ने जबड़े अपने उछाले
इन भोर के जवानों को
उठाओं छावनियों पर लगे है ताले

Sunday, 1 July 2018

हथेलियों में जादू है !

वो चमकती हथेलियों में कौन सी जागीर है
जिसे पाने को लोग बनने को चाहे हकीर है।

वो नजरें करम का आशियाना है
या बारिश का बागों में फैला फ़साना है।

क्या वो गुलों का ताज पहने कोई हूर है
कश्ती में सवार मीनाक्षी कसीर है!

ख्वाबों में पैबस्त हलकान नूरानी
खुश्क निरा हालाकि जगमग पेशानी?

गैरों पर दम नजरे करम
खालिक की नेमत सरासर विषम।

Saturday, 30 June 2018

दो पल

दो पल जी लो जरा सांसे कंवारी है
घट रही जिंदगी उम्र के भी अपने तमाशे है।

फैल रही आंस घुटने में चुभने लगी मजबूरी
अंतिम पड़ाव का संकेत और ये दूरी।

लाश एक जिन्दा भी लाश है एक मुर्दा भी
कड़वा सफर है माफ़ और साफ है दरिया भी।

नंगा हो गया जमाना किसी की फ़िक्र नही
हस्तियां बिक गई अपनी , उनका जिक्र नही।

आओ एक ताना बाना भविष्य का बना ले
अभी से ही राह मुश्किल समय की निकाले।

गोल गली जिस तरह नही होती
नींदे सच में कहो तो नही सोती।

एक आसान था बचपन सहज थी जवानी
अब वो पता नही कौन ले गया याचकदानी।

खुल गए राज

वो नजरें इनायत के राज खुल गए
मुहब्बत की जालियों में
खुद सामने आकर लिपटे बाँहों में
हमने लाजवंती के गीत गाए गलियों में।

सुबह सवेरे यार खुद
ही आकर मचल गया
लू लगे बदन को रूह से
अपनी प्यारी मसल गया।

ताउम्र एहसान से उसके
रहेंगे सराबोर हम
गजल किनारे नदियां के
लिखते गाते रहेंगे उसके हम।

आग और दरिया में फासला
सिर्फ कुदरत का है अजीजों
वरना मुहब्बत और नफरत
का रिश्ता एक हो तो खरीद लो।

मुसलसल रहा जाहिर रोज
मगर , मुहब्बत के ताने बाने से
खुदगर्ज दिलबर ने बिताए पल
खबर ही न रही उसके जाने की।

राजनितिक दलों की राजनितिक आस्था

नमस्ते साथियों ,

देश की सियासत के पांच नमूने -

१. भारतीय मिडिया

२. धार्मिक आस्थाएं

३. लोकलुभावन वादे

४. योजनाओं की प्रचार सामग्रियां

५. सोशल मिडिया

यानि मूलतः सत्ता का बुनियादी लक्ष्य वर्तमान में आमजन का जीवन सरलता तथा विकाशशील करना होता है , किन्तु वर्तमान में ही , इसकी परिभाषा बदल चुकी है। यानि आज के विकास का नाम आस्थाएं , भड़काऊं उद्दाम भाषा में बदल चूका है। है कोई सत्ता और सत्ता के सहयोगी प्रतिनिधि जिनके वादों और बयानों पर रोक लगाएं ?

यह नियत का खेल है बाबू जो सही रस्ते पर होगा वह हर गलत पर वार करेगा , क्योकि उसका लक्ष्य कोई मकसद का साधना नहीं वरन अपने पीछे खड़े लोगों की मदद करना है।


Tuesday, 19 June 2018

सरफ़रोशी

कत्ल जिन ख्वाहिशों को मैंने कुर्बान तेरे लिया किया है
रब ने बंदगी का मगर इनाम तुझे दिया है !

सर पे लाल लहू चढ़कर सरफ़रोशी मांगता है
बाजुए कलंदर वीरगति को ठानता है।

है बचा नहीं कुछ और तुझपर लुटाने को
याद है मुझे कहीं दिन नहीं तेरे लालों पास था खाने को।

हुक्मरान जितने ताबीज चाहे बस में करने को बना लें
न टूटा है हौसला न टूटेगा , जा जितना इज्जत उछालना है उछाल लो। 

Friday, 4 May 2018

जनता के कंधो पर लोकतंत्र

नमस्ते परम् प्रेम साथियों ,

गुजरें दिवस की बात है , शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश सूबे के मुख्यमंत्री बाढ़ का जायज लेने प्रभावित इलाके में गए थे । तब उनसे स्वयं पानी में चलकर जाते नही बना । क्योकि उनका लक्ष्य था जुते भीगे नही पैर गंदे न हो , इसलिये उन्हें सुरक्षाकर्मियों ने पानी से बाहर सूखे में निकाला ।

अब सवाल और मुद्दा यह है , हमने राजनीत में पढ़ा है जनता के हितों का ध्यान प्रदेश का मुखिया रखता है और यह उसका परम् कर्तव्य भी है ।

लेकिन यहां तो सुरक्षाकर्मी उन्हें कंधो पर रखकर इलाका पार करा रहे है , जरा आप समझिये जो खुद कंधे पर सवार है वह किस प्रकार जनता के हितों का भार अपने स्कंद पर रखेगें ?

बेटियों की रक्षा कैसे करेगें ?

राजनीति से औधौगिक घराने की दोस्ती कानून पर भारी पड़ जाती है?

  नमस्कार , लेख को विस्तृत न करते हुए केवल सारांशिक वेल्यू में समेटते हुए मै भारतीय राजनीत के बदलते हुए परिवेश और उसकी बढ़ती नकारात्मक शक्ति ...