Monday, 20 May 2019

मोदी का विरोध राजद्रोह नही देशसेवा है!

साथियों बीते दिनों सत्ताधारी दल द्वारा विपक्ष एवं मोदी की गलत दिग्भ्रमित नीतियों उद्देश्यों के विरूद्ध जो बोल रहा था वह राजद्रोही बना दिया जा रहा था । और कहीं न कही सत्ताधारी दल यह चाहता था की भारत में ऐसा माहौल बनाया जाए की मोदी विरोध को राष्ट्रविरोध में बदल दिया जाए और ऐसा करने में सत्ताधारी दल सफल हुआ भी जिसका लाभ इसे मौजूदा चुनाव में मिला भी।

अंग्रेजों ने भारत पर लगभग 250 साल राज किया था उनका अपना तंत्र भी भारत में मायने रखता है । उसे सरकार की मान्यता थी । परन्तु देखने वाली बात इसमें यह रही की अंग्रेजो के विरोध में हमारे कहीं बलिदानी महापुरुष अंग्रेजो की गलत नीतियों का विरोध करते रहे और यहां तक की उन्हें अंग्रेजी हुकूमत द्वारा मृत्युदण्ड भी दिया गया । भगतसिंह और अन्य जाबांज शहीद इसका उदाहरण है।

तो क्या हम अंग्रेजों के विरोध को राजद्रोह बतला देंगे जो मोदीकाल में मोदी की नीतियों का जनता ने विरोध किया तो ?
वास्तव में जवाब होगा नही ।

लेकिन फिर भी सत्ताधारी दल ने मोदी विरोध को राजद्रोह में बदलने का काम किया।
हमने भी शहीदों की विचारधारा का ही अनुसरण किया है और सत्ता की गलत नीतियों का विरोध किया है तो हमे राजद्रोही करार क्यों दिया जा रहा है ?

Wednesday, 4 July 2018

भारत की नई संस्कृति " भीड़तंत्र "

अनहद नमस्कार साथियों ,

भारत वह देश जो अनहद खूबियां लिए एक स्वर्ग की तरह बसा है । जिसके उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम हर दिशा में विश्व धरोहरें है ।

लेकिन कुछ समय से कुछ घटनाएँ लगातार सुनने देखने को मिल रही है , और खास बात यह की घटनाएं सामान्य नही है , क्योकि भारी संख्या में लोगों की हत्याएं होती हुई नजर आ रही है ।

इन सबके बीच और एक बात ध्यान योग्य , यह सभी घटनाएं भीड़ द्वारा किसी अफवाह के अंतर्गत अंजाम दी जा रही है । क्या इनसे यह नही लगता की लोग अंध श्रद्धा में लोगों के गले काट रहे ! क्या यह नही लगता की देश में लोगों को कानून संविधान का भय होता भी होगा ! सत्यता क्या यह नही की कहीं न कही सत्ता का समर्थन इन उपद्रवियों को तो नही मिल रहा!

यह सुनियोजित घटनाएं लगातार भारत की संस्कृति में तब्दील हो रही है । इससे महज और महज भारत और भारत के सामाजिक ताने बाने को भयंकर नुकसान ही होना है ।

Monday, 2 July 2018

अँधेरा घना है !

अगस्त्य की वाणी सही थी
घोर कलयुग बुरा आएगा
निशाचर कोई सतत भू पर
विपुल विकटता बरसायेगा।

         उजडी अऊसर वसु पर
         छाती मनु है अपनी पीटेंगे
         नेह की कमी का लाभ
         असुर अनय के रूप में करेंगे।

जीवन की अदृश्य कहानी
क्या बतलाऊं राकेश तुझे
कश्ती की पतवार टूटी
सवार एक स्वर में जूझे।
     
          किंचित मन में विरह
          बाजुओं के सो जाने की
          है कोई आशा किसी वीर
          के रक्षा के लिए आने की!

अब है निराश नीरज का हिय
कूलों ने जबड़े अपने उछाले
इन भोर के जवानों को
उठाओं छावनियों पर लगे है ताले

Sunday, 1 July 2018

हथेलियों में जादू है !

वो चमकती हथेलियों में कौन सी जागीर है
जिसे पाने को लोग बनने को चाहे हकीर है।

वो नजरें करम का आशियाना है
या बारिश का बागों में फैला फ़साना है।

क्या वो गुलों का ताज पहने कोई हूर है
कश्ती में सवार मीनाक्षी कसीर है!

ख्वाबों में पैबस्त हलकान नूरानी
खुश्क निरा हालाकि जगमग पेशानी?

गैरों पर दम नजरे करम
खालिक की नेमत सरासर विषम।

Saturday, 30 June 2018

दो पल

दो पल जी लो जरा सांसे कंवारी है
घट रही जिंदगी उम्र के भी अपने तमाशे है।

फैल रही आंस घुटने में चुभने लगी मजबूरी
अंतिम पड़ाव का संकेत और ये दूरी।

लाश एक जिन्दा भी लाश है एक मुर्दा भी
कड़वा सफर है माफ़ और साफ है दरिया भी।

नंगा हो गया जमाना किसी की फ़िक्र नही
हस्तियां बिक गई अपनी , उनका जिक्र नही।

आओ एक ताना बाना भविष्य का बना ले
अभी से ही राह मुश्किल समय की निकाले।

गोल गली जिस तरह नही होती
नींदे सच में कहो तो नही सोती।

एक आसान था बचपन सहज थी जवानी
अब वो पता नही कौन ले गया याचकदानी।

खुल गए राज

वो नजरें इनायत के राज खुल गए
मुहब्बत की जालियों में
खुद सामने आकर लिपटे बाँहों में
हमने लाजवंती के गीत गाए गलियों में।

सुबह सवेरे यार खुद
ही आकर मचल गया
लू लगे बदन को रूह से
अपनी प्यारी मसल गया।

ताउम्र एहसान से उसके
रहेंगे सराबोर हम
गजल किनारे नदियां के
लिखते गाते रहेंगे उसके हम।

आग और दरिया में फासला
सिर्फ कुदरत का है अजीजों
वरना मुहब्बत और नफरत
का रिश्ता एक हो तो खरीद लो।

मुसलसल रहा जाहिर रोज
मगर , मुहब्बत के ताने बाने से
खुदगर्ज दिलबर ने बिताए पल
खबर ही न रही उसके जाने की।

राजनितिक दलों की राजनितिक आस्था

नमस्ते साथियों ,

देश की सियासत के पांच नमूने -

१. भारतीय मिडिया

२. धार्मिक आस्थाएं

३. लोकलुभावन वादे

४. योजनाओं की प्रचार सामग्रियां

५. सोशल मिडिया

यानि मूलतः सत्ता का बुनियादी लक्ष्य वर्तमान में आमजन का जीवन सरलता तथा विकाशशील करना होता है , किन्तु वर्तमान में ही , इसकी परिभाषा बदल चुकी है। यानि आज के विकास का नाम आस्थाएं , भड़काऊं उद्दाम भाषा में बदल चूका है। है कोई सत्ता और सत्ता के सहयोगी प्रतिनिधि जिनके वादों और बयानों पर रोक लगाएं ?

यह नियत का खेल है बाबू जो सही रस्ते पर होगा वह हर गलत पर वार करेगा , क्योकि उसका लक्ष्य कोई मकसद का साधना नहीं वरन अपने पीछे खड़े लोगों की मदद करना है।


राजनीति से औधौगिक घराने की दोस्ती कानून पर भारी पड़ जाती है?

  नमस्कार , लेख को विस्तृत न करते हुए केवल सारांशिक वेल्यू में समेटते हुए मै भारतीय राजनीत के बदलते हुए परिवेश और उसकी बढ़ती नकारात्मक शक्ति ...